मन के अंधेरे मिटा ना पाये : Mann Ke Andhere Mita Naa Payee

माँ सरस्वती की असीम कृपा से एक स्वरचित कविता
जिसका शीर्षक है – “मन के अंधेरे मिटा ना पाये”
इस दीपावली, जुर्म का शिकार हुए हज़ारों लोगो को समर्पित

हज़ारों की फुलझड़िया फूँकी
लाखों के पटाखे सुलगाए
अपने घर को तो चमकाया
पर ग़रीब की भूख मिटा ना पाये
हमने दीये तो बहुत जलाये
पर मन के अंधेरे मिटा ना पाये ।।१।।

राम को पूजा, कृष्ण को पूजा
मानवता की कसमें खाई
पर धरे रह गये सारे वादे
जात-पात-ईर्ष्या को मन से मिटा ना पाये
उसके घर मे ख़ुशी देखकर
अपने उर की ख़ुशी जलायी
गले मिले और मिठाइयाँ भी बाँटी
पर तेरा मेरा मिटा ना पाये
हमने दीये तो बहुत जलाये
पर मन के अंधेरे मिटा ना पाये ।।२।।

लाखों बच्चे भूखे सो गये
कई घरों मे मायूसी छाई
पर कैसे मनी दीवाली उनकी
जिन्होनें कई घरों के चिराग बुझाये
हाय! इन जहर बेचने वालो को क्यों शर्म ना आये
हे प्रभु इतना हृदय तो सबको देना
कि कम से कम आँखो मे पानी आये
हमने दीये तो बहुत जलाये
पर मन के अंधेरे मिटा ना पाये ।।३।।

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ||

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आज फिर माँ ने दीये जलाये : Aaj Phir Maa Ne Diye Jalaye…

माँ सरस्वती की असीम कृपा से एक स्वरचित कविता
जिसका शीर्षक है – “आज फिर माँ ने दीये जलाये”
दीपावली के इस शुभ अवसर पर सभी माताओं को समर्पित

आज रगो मे उसकी लहु दौड़ा
आज चेहरे पर उसके लाली छाई
ख़ुशियों से भरे उसके मन ने
उसके सब दुख: दर्द भुलाये
जब लौट परिंदे घर को आये 
आज फिर माँ ने दीये जलाये ।।1।।

परदेश मे सुख से रह रहा लाल
पर उसका दिल सदा रहे बेहाल
कैसा होगा, मेरे बिन क्या करता होगा
इसी सोच मे उसने अपने दिन रात जलाये
पर आज खुशी से झूमे मन उसका
क्या क्या उसने पकवान बनाये
जब लौट परिंदे घर को आये 
आज फिर माँ ने दीये जलाये ।।2।।

माना प्रतीक है दीपक अंतर्मन को प्रकाशित करने का
पर आज नही छेड़ूँगा प्रसंग असुर पर देव विजय का
यह तो विषय है निश्छल, नि:स्वार्थ, और निर्मल प्रेम का
जैसे युगों पहले राम ने देश निकाला पाया
लेकिन जननी गोद की ख़ातिर स्वर्ण-तख्त ठुकराया
चौदह वर्षो तक कौशल्या की आँखों ने लहू बहाया
फिर रामवापसी पर जन-जन ने दीपों का पर्व मनाया
प्रिय-मिलन पर सबने मिलकर गीत सुमंगल गाये
जब लौट परिंदे घर को आये 
आज फिर माँ ने दीये जलाये ।।3।।

सर्वे भवन्तु सुखिन:।।
दीपावली शुभ हो