आज फिर माँ ने दीये जलाये : Aaj Phir Maa Ne Diye Jalaye…

माँ सरस्वती की असीम कृपा से एक स्वरचित कविता
जिसका शीर्षक है – “आज फिर माँ ने दीये जलाये”
दीपावली के इस शुभ अवसर पर सभी माताओं को समर्पित

आज रगो मे उसकी लहु दौड़ा
आज चेहरे पर उसके लाली छाई
ख़ुशियों से भरे उसके मन ने
उसके सब दुख: दर्द भुलाये
जब लौट परिंदे घर को आये 
आज फिर माँ ने दीये जलाये ।।1।।

परदेश मे सुख से रह रहा लाल
पर उसका दिल सदा रहे बेहाल
कैसा होगा, मेरे बिन क्या करता होगा
इसी सोच मे उसने अपने दिन रात जलाये
पर आज खुशी से झूमे मन उसका
क्या क्या उसने पकवान बनाये
जब लौट परिंदे घर को आये 
आज फिर माँ ने दीये जलाये ।।2।।

माना प्रतीक है दीपक अंतर्मन को प्रकाशित करने का
पर आज नही छेड़ूँगा प्रसंग असुर पर देव विजय का
यह तो विषय है निश्छल, नि:स्वार्थ, और निर्मल प्रेम का
जैसे युगों पहले राम ने देश निकाला पाया
लेकिन जननी गोद की ख़ातिर स्वर्ण-तख्त ठुकराया
चौदह वर्षो तक कौशल्या की आँखों ने लहू बहाया
फिर रामवापसी पर जन-जन ने दीपों का पर्व मनाया
प्रिय-मिलन पर सबने मिलकर गीत सुमंगल गाये
जब लौट परिंदे घर को आये 
आज फिर माँ ने दीये जलाये ।।3।।

सर्वे भवन्तु सुखिन:।।
दीपावली शुभ हो

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