नया साल नया सवेरा: Naya Saal Naya Savera…

माँ सरस्वती की असीम कृपा से एक स्वरचित कविता
जिसका शीर्षक है – “नया साल नया सवेरा”

भूली बिसरी यादों के साथ
समय चक्र आ पहुँचा है फिर से उसी छोर पर
जहाँ बैठकर बुने थे हमने लाखों सपने
जहाँ तय की थी हमने अपनी नई मंजिले
सारे उतार-चढ़ावों का हिसाब भी लगाया था
दोस्तों के साथ बैठकर सुख-दुख भी बाटें थे
और कैसे उस हबीब की याद मे हम खोये खोये से थे
आज भी वही आलम है, वही मंज़र है
उसके बिछड़ने का ग़म आज भी है, आज भी आँखो मे आँसू है
आज भी ज़माने का तमाशा तो वही है बस क़िरदार नये है
ना ही हमने भी अपना अंदाज़े-गुफ़्तुगू बदला
और ना ही अपनी महफ़िले बदली
बस महफ़िलों मे चेहरे नये है
शिकस्तो का जो दौर कल था वो आज भी है
नाक़िद, रकीब और ये अहदे-रिया कल भी थे और आज भी है
आगे बढ़ने के सपने आज भी वैसे ही है
लेकिन आँखों मे आज नई चमक सी है
नये सवेरे के साथ आगे बढ़ने का नया उत्साह है
मुश्किले है, पर असफलताओं ने हमारे हौसले भी बढ़ाएँ है
बस अब फिर से बढ़ चलना है
इस समय चक्र के साथ
नया जोश और नया अनुराग लिए
अपनी अपनी मंज़िलों की ओर
कर्म पथ पर, कर्म पथ पर, कर्म पथ पर… ।।

नववर्षं नवचैतन्यं ददातु ।।
शुभं  करोति  कल्याणं ।।
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