आइए फिर से लें यही शपथ: Aaiye Fir Se Le Yahi Shapath…

नमस्कार,
 
आप सभी देशवासियों को ६७वें गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ।
 
आप सभी जानते है कि, जनवरी २६, १९५० को भारतीय गणतंत्र का जन्म हुआ। लेकिन क्यों?
इसकी क्या आवश्यकता थी?
क्या आज़ाद होना ही काफ़ी नही था?
आख़िर क्यों हमारे पूर्वजों ने ३ वर्ष के मंथन के बाद एक क्लिष्ट और नीरस पुस्तक की रचना की?
 
इस प्रश्न के अनेक उत्तर हो सकते हैं, और उनमें से कुछ सरलतम एवम् प्रवाभी तर्को से आप परिचित भी हैं।
पिछले ६० सालों में, काफ़ी हद तक संविधान मे निहित विचारों से देश के नागरिकों मे न्याय, स्वतन्त्रा, एवम् समानता की भावनाओं और राष्ट्र-बंधुता मे आशातीत बढ़ोतरी हुई है। लेकिन इस सब के बाबजूद भी देश मे धर्म और जाति के नाम पर होने वाली हिंसाओं मे साल-दर-साल बढ़ोतरी हो रही है। संविधान की कुछ कमज़ोरियों और जनता की कम साक्षरता की वजह से कुछ लोग आज भी अपनी रोटियाँ सेकने मे लगे है। 
कुछ कहते है कि, देश मे हिंदू सुरक्षित नही है..
कुछ कहते है कि, देश मे मुस्लिम सुरक्षित नही है..
कुछ कहते है कि, देश मे दलित सुरक्षित नही है..
और कुछ संपन्न लोग कहते है कि, देश मे उनका परिवार सुरक्षित महसूस नही कर रहा है..
आख़िर क्या है ये सब?
इतिहास गवाह है कि, जब जब देश पर या देश के किसी भी परिवार पर कोई विपत्ति आई है, तब तब इस तरह की मानसिकता वाले लोगो ने केवल अराजकता फैलाने का ही काम किया है।
 
जब देश मे बम धमाके होते है, जब देश पर कोई प्राकर्तिक आपदा आ पड़ती है, तो उनका कहर कोई धर्म या कोई जाति देखे बिना हम सब पर टूट पड़ता है। हम किसी भी जाति, किसी भी धर्म के लोग हो, लेकिन जब हमारे जवान देश के लिए शहीद होते है, तो हम सबकी आँखे नम होती है। जब देश अनेक वैश्विक प्रतिस्पर्धाओं मे प्रथम आता है तो हम सब एक साथ गौरव का अनुभव करते है।
 
देश मे कुछ इस तरह के असामाजिक तत्व हैं, जो समाज को बाटने का काम करके देश के आधारभूत ढ़ाचे पर चोट करते रहते हैं। हमे इस तरह के असामाजिक लोगो से बचना चाहिए। यह समय है जब देश प्रगती के पथ पर तेज़ी से आगे बढ़ता जा रहा है, लेकिन यह सावधानी बरतने का भी समय है। जाति और धर्म के नाम पर हुई एक भी चूक, देश की तरक्की के मार्ग मे अवरोध पैदा कर सकती है।
 
हमे विश्व के इतिहास से यह बात तो ज़रूर ही सीखनी चाहिए कि, समाज को विकास और न्याय उनकी सरकारों या उनके शासकों से नही मिलता, बल्कि विकास और न्याय मिलता है उस समाज की सोच से, उस समाज या देश के नागरिकों के आधारभूत मानव मूल्यों से। किसी भी देश की सरकार या शासक वैसे ही होगें, जैसी वहाँ की जनता होगी।
 
आइए इस गणतंत्र दिवस पर एक बार फिर से वही प्रण ले, फिर से यही वचन लें:
 
हम, भारत के लोग, भारत को एक
संपूर्ण प्रभुत्वसंपन्न समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य
बनाने के लिए, तथा उसके समस्त नागरिकों को:
सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय,
विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता,
प्रतिष्ठा और अवसर की समता, प्राप्त कराने के लिए,
तथा उन सबमें,
व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता
सुनिश्चित कराने वाली, बंधुता बढ़ाने के लिए,
दृढ़ संकल्प होकर आज फिर से तारीख २६ जनवरी, २०१६ ई.
को एतद् द्वारा इस संविधान को
अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं। 
 
जय हिंद!
Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s