Poem: भारत माँ की गोद

माँ सरस्वती की असीम कृपा से एक स्वरचित कविता
जिसका शीर्षक है – “भारत माँ की गोद ”
स्वतंत्रता दिवस पर शहीदो को समर्पित…

वीरों के शोणित से शोभित, केसरिया है, बलिदानी है,
अहिंसा का पाठ पढ़ाती, श्वेत-शांत है, विश्वगुरु है,
कोटि-कोटि के तन से संचित, हरियाली है, अभिराम है,
सर्वधर्म, समभाव, समता से युक्त, ओजवान है, न्यारी है,
तेरी गोद हे, जगत-जननी माँ, भारत माँ, हमको सबसे प्यारी है ||

तेरे आँचल की अतुलित महिमा कवियों ने गायी,
तेरे लिए ही प्रभु राम ने सोने की लंका ठुकराई,
देवव्रत ने व्रत लिया, और कृष्ण ने गीतासार सुनाया,
इसी गोद से गौतम ने दुनिया को ‘मध्यम मार्ग’ दिखाया,
आज ऋणी दुनिया है जिसकी, सौम्यता से युक्त है, न्यारी है,
तेरी गोद हे, जगत-जननी माँ, भारत माँ, हमको सबसे प्यारी है ||

आर्यभट्ट, धन्वंतरि, चरक, और शंकर ने ज्ञानपुंज जलाये,
चन्द्र्गुप्त, पृथ्वी, महाराणा, और शिवाजी ने वीरोचित्त गुण पाए,
लक्ष्मी, पद्मानी, सरोजनी, और लता पर तो माँ तुमको भी अभिमान है,
सहस्त्रो बलिदानो के बल पर ही जिंदा हिन्दुस्तान है,
जब भगत सिंह-सुखदेव-गुरु ने आगे बढ़कर तेरे आलिंगन को पाया,
और गाँधी के अहिंसा चक्र ने अंग्रेज़ो को नाच नचाया,
तब कटी बेड़ियाँ माँ की, अब निर्मल शुभ सुप्रभात से युक्त है, न्यारी है,
तेरी गोद हे, जगत-जननी माँ, भारत माँ, हमको सबसे प्यारी है ||

नमो नमो वन्दे माँ भारती….

Poem: अब सब कुछ छूट गया

एक स्वरचित कविता, जिसका शीर्षक है – “अब सब कुछ छूट गया”……

आगे बढ़ने की धुन मे,
अब सब कुछ छूट गया………
वो माँ की गोद अब कहाँ?
वो प्यारा बचपन अब कहाँ?
ना है अब वो गलियो के दोस्त,
ना है अब वो गांव की शाम,
कैसे भूलु वो दीवाली की रातें,
कैसे भूलु वो रॅंगो का त्योहार,
मार पीट कर जब माँ गालो से रँग छूटाती थी,
प्यार से फिर जब दादीमाँ गालो पर तेल लगाती थी,
बाबूजी और दादा संग जब मेले देखने जाते थे,
देख खिलौने और जलेबी हम रोने लग जाते थे,
वो गणतन्त्र दिवस पर सबसे आगे चलने की ज़िद,
देश पर मिटने का जज़्बा तब कितना था,
पर अब सब कुछ टूट गया,
आगे बढ़ने की धुन मे,
अब सब कुछ छूट गया………
जब हुए तरुण तो मन मे,
फिर आगे बढ़ने की आग लगी,
गांव छूटा, शहर छूटा, छूटे सारे रिस्ते-नाते,
कर्मभूमि प्रयाग मे अब,
कुछ कर गुजरने की आश् जगी,
मधुर था, यह स्वर्णिम युग था मेरा,
मित्रो एवम् गुरुओ का स्नेह भी पाया,
फिर मैने अपने लक्ष्य की और प्रथम चरण उठाया,
छूटे वो सब गुरु-मित्र,
फिर से वो क्षण आया,
आगे बधने की धुन मे,
अब सब कुछ छूट गया………
ऐसा क्यो होता है अक्सर,
बिछड़ जाते सब पल भर के अंदर,
अब नया शहर, नया लक्ष्य, और नया सवेरा,
लेकिन मुझको उन सारी यादो ने घेरा,
अब तो लगता है जैसे फिर से अकेला हो गया,
आगे बधने की धुन मे,
अब सब कुछ छूट गया………