नारी: Naari…

माँ सरस्वती की असीम कृपा से एक स्वरचित कविता
जिसका शीर्षक है – “नारी ”

वो हमको इस दुनिया मे लायी
अपना अमृतमयी नीर पिलाकर पाला पोषा
अपना सुख दुख भुलाकर पूरा स्नेह लुटा दिया
हमारे हर एक आँसू, हर एक दर्द पर
वो सौ-सौ आँसू रोई है
हमारी हर एक मुस्कान पे 
उसने कई कई जीवन जियें है
आज भी हमारी हर सिसकी पर
वो कुल-मुला उठती है
नारी का यह रूप ‘माँ’ सच में अतुल्य है ।।

हमारी तरह ही वो हर काम करने मे सक्षम है
फिर भी बाबू जी को एक आँख ना सुहाती है
बस लड़की होना ही उसका क़सूर है
लिखने-पढ़ने का उसका मन तो है
पर सब कहते है क़ि लड़कियाँ पढ़ कर क्या करेंगी
इसलिए ही कहने से डरती है
सुबह-शाम बस घर के ही कामों मे उलझी रहती है 
घर की चार-दीवारी ही बस उसका संसार है
इस घुटे घुटे बचपन मे भी उसमे उमंगे बाकी है
राखी के दिन वो सुबह से हमारा इंतज़ार करती है
बस हमारी एक मुस्कान भर से ही वो चहक उठती है, खिल उठती है
नारी का यह रूप ‘बहन’ सच मे न्यारा है ।।

हमारा हर सुख-दुख, अब उसका भी सुख-दुख है
हमारी हर ज़िम्मेदारी, अब उसकी भी ज़िम्मेदारी है
दुख की पथरीली राहों पर वो हमारे साथ साथ चली है
कई कई बार उसने हमे संभाला है, हौसला दिया है
हमने साथ साथ जीनें और साथ साथ मरने की कसमें खाई है
जीवनसंगिनी हमारी हमसाया, हमनवा, हमराज़ है
नारी के इस रूप के बिना जिंदगी बस एक कोरा सपना है ।।

लेकिन अज़ीब से हालात हैं, एक अज़ीब घुटन सी है
यह कैसा समाज़ है, इसके सब उलटे रिवाज़ है
बेटे के जन्म पर घरों मे खुशियाँ, लेकिन
बेटी के जन्म पर मातम है
बेटे के जन्म पर पिता को बधाइयाँ और
बेटी के जन्म पर माँ को सज़ाए है
धरती मे जो बीज़ बोया जाता है वो ही पौधा अंकुरित होता है
फिर क्यों कई माताएँ आज भी पीड़ित होती है
क्यों कई बहुएँ बेटीयाँ जनने पर जला दी जाती है
इस देश मे ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:’ जैसे उद्घोष गूंजते है
हम वही लोग है जो दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती को पूजते है
फिर क्यों कई बेटीयों की जन्म से पहले या बाद मे हत्या कर दी जाती है
क्यों कई लड़कियों का बचपन घरों की चार-दीवारी मे क़ैद है ।।

यदि यही रहा व्यवहार पुरुष का, तो अंत निकट है
नारी बिन यह मनुज जीवन तो बस कल्पित है
यही समय है जागो, ना अपना काल बुलाओ
सृष्टि के अनमोल सृजन ‘नारी’ को ना ठुकराओ ।।

बेटी बचाओ
बेटी पढ़ाओ ।।

इसी संदर्भ मे कवि ‘द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी जी’ के
खंडकाव्य ‘सत्य की जीत’ से दो पंक्तियाँ :

“पुरुषों के पौरुष से ही नही बनेगी यह धरा स्वर्ग ,
चाहिए नारी का नारित्व तभी होगा यह पूरा सर्ग ।। ”

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नया साल नया सवेरा: Naya Saal Naya Savera…

माँ सरस्वती की असीम कृपा से एक स्वरचित कविता
जिसका शीर्षक है – “नया साल नया सवेरा”

भूली बिसरी यादों के साथ
समय चक्र आ पहुँचा है फिर से उसी छोर पर
जहाँ बैठकर बुने थे हमने लाखों सपने
जहाँ तय की थी हमने अपनी नई मंजिले
सारे उतार-चढ़ावों का हिसाब भी लगाया था
दोस्तों के साथ बैठकर सुख-दुख भी बाटें थे
और कैसे उस हबीब की याद मे हम खोये खोये से थे
आज भी वही आलम है, वही मंज़र है
उसके बिछड़ने का ग़म आज भी है, आज भी आँखो मे आँसू है
आज भी ज़माने का तमाशा तो वही है बस क़िरदार नये है
ना ही हमने भी अपना अंदाज़े-गुफ़्तुगू बदला
और ना ही अपनी महफ़िले बदली
बस महफ़िलों मे चेहरे नये है
शिकस्तो का जो दौर कल था वो आज भी है
नाक़िद, रकीब और ये अहदे-रिया कल भी थे और आज भी है
आगे बढ़ने के सपने आज भी वैसे ही है
लेकिन आँखों मे आज नई चमक सी है
नये सवेरे के साथ आगे बढ़ने का नया उत्साह है
मुश्किले है, पर असफलताओं ने हमारे हौसले भी बढ़ाएँ है
बस अब फिर से बढ़ चलना है
इस समय चक्र के साथ
नया जोश और नया अनुराग लिए
अपनी अपनी मंज़िलों की ओर
कर्म पथ पर, कर्म पथ पर, कर्म पथ पर… ।।

नववर्षं नवचैतन्यं ददातु ।।
शुभं  करोति  कल्याणं ।।

मन के अंधेरे मिटा ना पाये : Mann Ke Andhere Mita Naa Payee

माँ सरस्वती की असीम कृपा से एक स्वरचित कविता
जिसका शीर्षक है – “मन के अंधेरे मिटा ना पाये”
इस दीपावली, जुर्म का शिकार हुए हज़ारों लोगो को समर्पित

हज़ारों की फुलझड़िया फूँकी
लाखों के पटाखे सुलगाए
अपने घर को तो चमकाया
पर ग़रीब की भूख मिटा ना पाये
हमने दीये तो बहुत जलाये
पर मन के अंधेरे मिटा ना पाये ।।१।।

राम को पूजा, कृष्ण को पूजा
मानवता की कसमें खाई
पर धरे रह गये सारे वादे
जात-पात-ईर्ष्या को मन से मिटा ना पाये
उसके घर मे ख़ुशी देखकर
अपने उर की ख़ुशी जलायी
गले मिले और मिठाइयाँ भी बाँटी
पर तेरा मेरा मिटा ना पाये
हमने दीये तो बहुत जलाये
पर मन के अंधेरे मिटा ना पाये ।।२।।

लाखों बच्चे भूखे सो गये
कई घरों मे मायूसी छाई
पर कैसे मनी दीवाली उनकी
जिन्होनें कई घरों के चिराग बुझाये
हाय! इन जहर बेचने वालो को क्यों शर्म ना आये
हे प्रभु इतना हृदय तो सबको देना
कि कम से कम आँखो मे पानी आये
हमने दीये तो बहुत जलाये
पर मन के अंधेरे मिटा ना पाये ।।३।।

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ||

आज फिर माँ ने दीये जलाये : Aaj Phir Maa Ne Diye Jalaye…

माँ सरस्वती की असीम कृपा से एक स्वरचित कविता
जिसका शीर्षक है – “आज फिर माँ ने दीये जलाये”
दीपावली के इस शुभ अवसर पर सभी माताओं को समर्पित

आज रगो मे उसकी लहु दौड़ा
आज चेहरे पर उसके लाली छाई
ख़ुशियों से भरे उसके मन ने
उसके सब दुख: दर्द भुलाये
जब लौट परिंदे घर को आये 
आज फिर माँ ने दीये जलाये ।।1।।

परदेश मे सुख से रह रहा लाल
पर उसका दिल सदा रहे बेहाल
कैसा होगा, मेरे बिन क्या करता होगा
इसी सोच मे उसने अपने दिन रात जलाये
पर आज खुशी से झूमे मन उसका
क्या क्या उसने पकवान बनाये
जब लौट परिंदे घर को आये 
आज फिर माँ ने दीये जलाये ।।2।।

माना प्रतीक है दीपक अंतर्मन को प्रकाशित करने का
पर आज नही छेड़ूँगा प्रसंग असुर पर देव विजय का
यह तो विषय है निश्छल, नि:स्वार्थ, और निर्मल प्रेम का
जैसे युगों पहले राम ने देश निकाला पाया
लेकिन जननी गोद की ख़ातिर स्वर्ण-तख्त ठुकराया
चौदह वर्षो तक कौशल्या की आँखों ने लहू बहाया
फिर रामवापसी पर जन-जन ने दीपों का पर्व मनाया
प्रिय-मिलन पर सबने मिलकर गीत सुमंगल गाये
जब लौट परिंदे घर को आये 
आज फिर माँ ने दीये जलाये ।।3।।

सर्वे भवन्तु सुखिन:।।
दीपावली शुभ हो

शक्ति स्वरूपा माँ जगदंबा : Shakti Swaroopa Maa Jagdamba

माँ सरस्वती की असीम कृपा से एक स्वरचित कविता
जिसका शीर्षक है – “शक्ति स्वरूपा माँ जगदंबा”

शक्ति स्वरूपा माँ जगदंबा बस इतना वर दे
मनोकामना पूरी कर दे ।।1।।

कांतिवान शोभा अति सुंदर भाल टीका शोभते
शंख चक्र गदा त्रिशूल धनुष खड़ग कर शोभते
सिंह बिरजती माता जन जन के कष्ट हरे
शक्ति स्वरूपा माँ जगदंबा बस इतना वर दे
मनोकामना पूरी कर दे ।।2।।

प्रचंड कालिका रूप तुम धारे,  रक्तबीज दानव सब मारे
परम शक्ति रूप धरी माता,  महिषाशुर राक्षस संहारे
अन्नापूर्णा रूप माँ जब धरही,  कोटि कोटि की तृष्णा हर लेही
जब माँ शिव वाम भाग बिराजे,  सकल सृष्टि भव सागर तारे
शक्ति स्वरूपा माँ जगदंबा बस इतना वर दे
मनोकामना पूरी कर दे ।।3।।

हे शैलपुत्री,  हे ब्रह्मचारिणी,  हे चंद्रघंटा नमो नम:
हे कुशमंदा,  हे स्कंदमाता,  हे कात्ययिनी नमो नम:
हे कालरात्रि,  हे महागौरी,  हे सिद्धिदात्री नमो नम:
नमो नमो नवदुर्गा मंगलकरनी बुद्धि, विवेक, ओज से भर दे
हे पापनाशनी भवतारिणी माता, उर का दानव हर ले
शक्ति स्वरूपा माँ जगदंबा बस इतना वर दे
मनोकामना पूरी कर दे ।।4।।

ॐ दुर्गायै नमः।।

Poem: भारत माँ की गोद

माँ सरस्वती की असीम कृपा से एक स्वरचित कविता
जिसका शीर्षक है – “भारत माँ की गोद ”
स्वतंत्रता दिवस पर शहीदो को समर्पित…

वीरों के शोणित से शोभित, केसरिया है, बलिदानी है,
अहिंसा का पाठ पढ़ाती, श्वेत-शांत है, विश्वगुरु है,
कोटि-कोटि के तन से संचित, हरियाली है, अभिराम है,
सर्वधर्म, समभाव, समता से युक्त, ओजवान है, न्यारी है,
तेरी गोद हे, जगत-जननी माँ, भारत माँ, हमको सबसे प्यारी है ||

तेरे आँचल की अतुलित महिमा कवियों ने गायी,
तेरे लिए ही प्रभु राम ने सोने की लंका ठुकराई,
देवव्रत ने व्रत लिया, और कृष्ण ने गीतासार सुनाया,
इसी गोद से गौतम ने दुनिया को ‘मध्यम मार्ग’ दिखाया,
आज ऋणी दुनिया है जिसकी, सौम्यता से युक्त है, न्यारी है,
तेरी गोद हे, जगत-जननी माँ, भारत माँ, हमको सबसे प्यारी है ||

आर्यभट्ट, धन्वंतरि, चरक, और शंकर ने ज्ञानपुंज जलाये,
चन्द्र्गुप्त, पृथ्वी, महाराणा, और शिवाजी ने वीरोचित्त गुण पाए,
लक्ष्मी, पद्मानी, सरोजनी, और लता पर तो माँ तुमको भी अभिमान है,
सहस्त्रो बलिदानो के बल पर ही जिंदा हिन्दुस्तान है,
जब भगत सिंह-सुखदेव-गुरु ने आगे बढ़कर तेरे आलिंगन को पाया,
और गाँधी के अहिंसा चक्र ने अंग्रेज़ो को नाच नचाया,
तब कटी बेड़ियाँ माँ की, अब निर्मल शुभ सुप्रभात से युक्त है, न्यारी है,
तेरी गोद हे, जगत-जननी माँ, भारत माँ, हमको सबसे प्यारी है ||

नमो नमो वन्दे माँ भारती….

Poem: अब सब कुछ छूट गया

एक स्वरचित कविता, जिसका शीर्षक है – “अब सब कुछ छूट गया”……

आगे बढ़ने की धुन मे,
अब सब कुछ छूट गया………
वो माँ की गोद अब कहाँ?
वो प्यारा बचपन अब कहाँ?
ना है अब वो गलियो के दोस्त,
ना है अब वो गांव की शाम,
कैसे भूलु वो दीवाली की रातें,
कैसे भूलु वो रॅंगो का त्योहार,
मार पीट कर जब माँ गालो से रँग छूटाती थी,
प्यार से फिर जब दादीमाँ गालो पर तेल लगाती थी,
बाबूजी और दादा संग जब मेले देखने जाते थे,
देख खिलौने और जलेबी हम रोने लग जाते थे,
वो गणतन्त्र दिवस पर सबसे आगे चलने की ज़िद,
देश पर मिटने का जज़्बा तब कितना था,
पर अब सब कुछ टूट गया,
आगे बढ़ने की धुन मे,
अब सब कुछ छूट गया………
जब हुए तरुण तो मन मे,
फिर आगे बढ़ने की आग लगी,
गांव छूटा, शहर छूटा, छूटे सारे रिस्ते-नाते,
कर्मभूमि प्रयाग मे अब,
कुछ कर गुजरने की आश् जगी,
मधुर था, यह स्वर्णिम युग था मेरा,
मित्रो एवम् गुरुओ का स्नेह भी पाया,
फिर मैने अपने लक्ष्य की और प्रथम चरण उठाया,
छूटे वो सब गुरु-मित्र,
फिर से वो क्षण आया,
आगे बधने की धुन मे,
अब सब कुछ छूट गया………
ऐसा क्यो होता है अक्सर,
बिछड़ जाते सब पल भर के अंदर,
अब नया शहर, नया लक्ष्य, और नया सवेरा,
लेकिन मुझको उन सारी यादो ने घेरा,
अब तो लगता है जैसे फिर से अकेला हो गया,
आगे बधने की धुन मे,
अब सब कुछ छूट गया………